Friday, June 27, 2008

एक शाम जिंदगी की..


एक और शाम जिंदगी की
दूर सबसे, फिर भी अनेको के बीच
न कोई सवाल, न किसी की शिकायतए
एक ऐसी ही शाम जिंदगी की

देर सारी उलझाने मन में लिए
बिन कोई भावना ,बिन कोई सपने बुने
घिरी हुई हूँ अजनबी चेहरों के बीच
एक सफर में , बिन किसी के हमसफ़र हुए

दूर कहीं सागर में सूरज डूब रहा है
किरणों को अपनी बाहों में समेट रहा है
धुंध भी पहाडो पे धीरे धीरे छा रही है
अपने आगोश में उन्हें लिये,चैन की साँस ले रही है

सब कितना शांत लग,कितना शीतल लग रहा है
जैसे कोई सपना हर ऑख में पल रहा है
पर मेरी आँख इतनी नम् क्यों है?
छोटी छोटी खुशियाँ मुझ से ही दूर क्यों है?

काश की ये सफर कभी खत्म न हो
इस राह की मंजिल कहीं न हो
ये वक्त बस अब यही थम जाए
मेरी जिंदगी की हर शाम ऐसी हो जाए...

Friday, June 20, 2008

डूबती कश्ती

न आसमान की चाहत की
और न विस्तृत जमीन की
न सागर की चाहत की
और न असीमित ऐश्वर्य की

छोटी छोटी सी खुशियाँ चाही
पर बड़े बड़े सपने नही देखे
थोड़ा थोड़ा सा जिंदगी में सुकून चाहा
पर और ज्यादा ज्यादा की आरजू नही सजाई

रिश्तो के एक अटूट डोर जरूर चाही
पर नफरत की ये आंधी तो मांगी
सबके चेहरे पर मुस्कुराहट जरूर चाही
पर इल्जामो की जड़ी तो नही मांगी

किसने सोचा था की एक दिन जिंदगी यहाँ ले आएगी
जो राह फूलो की थी, वही अब काटों सी हो जायेगी
जहाँ से सुरु किया था सफर, जिंदगी वही खड़ी नज़र आएगी
मझदार में फ़सी मेरी कश्ती डूबती नज़र आएगी..

Saturday, June 14, 2008

क्यों है...

जाने क्या क्या चाहता है ये मन
न जाने क्यों इतना बेचैन रहता है हर पल
कभी ये पंछी बन उड़ जाना चाहता है
तो कभी ये नदिया बन बह जाना चाहता है

कभी ये फूल बन महकना चाहता है
तो कभी तारा बन चमकना चाहता है
पल पल न जाने कितने सपने सजाता है
और अगले ही पल अपने हाथों से उनका गला घोट देता है

चाहने न चाहने से मेरे क्या होता है
होने या न होने का फ़ैसला तो कोई और करता है
कश्तियाँ तो समुद्र मे कई उतरती है
साहिल तक पहुचने का फ़ैसला तूफ़ान करता है

क्या इसे लकीरों का लिखा कहते है
या किसी का निर्धारित फ़ैसला
ऐसा है तो वो बिछडने वालो को मिलाता क्यों है
खोने वालो को एक बार देता ही क्यों है...